Monday, September 28, 2015

हिन्दी और राजनीति




गत सप्ताह मैंने आप लोगों से हिन्दी विश्व सम्मलेन और हमारे व्हट्स एप्प समूह के सम्बन्ध में बात की थी और हंसी ठिठोली में हिन्दी भाषा की दुर्गति की भी बात की. चूँकि मैंने आप लोगों से, हिन्दी विषय पर दो और भाग लिखने का वादा किया था , सो चली आई. वादा किया तो निभाना पड़ेगा. आज आप लोगों से हिन्दी को लेकर खेली जा रही राजनीति पर चर्चा करना चाहती हूँ.
      अब आप लोग यह तो जानते हैं की हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा प्राप्त नहीं हैं. हमारा देश विवधता के देश हैं और भाषा को लेकर भी यह विविध्ता देखने को मिलती हैं. ऐसे में यह कहना की हिन्दी को प्राथमिकता दी जाय कहाँ तक सही हैं.
      समय समय पर हिन्दी भाषा की श्रेष्ठता को लेकर हल चल होती रहती हैं और हमारे राजनेता जो हिन्दी में उद्बोधन देते हैं, अपने आप को श्रेष्ठ एवं देश प्रेमी बताते हैं. और हम अबोध नागरिक उनके इस झांसे में आ जाते हैं.
परन्तु क्या ऐसा करने से हिन्दी को वो स्थान मिल जाएगा जिसके लिए इतने यतन किये जा रहे हैं? अब देखिये राजनीति कैसे खेली जाती हैं. एक और हमारे राजनेता हिन्दी को बढावा देने को कहता हैं और कुछ राजनैतिक दल अपने को हिन्दी सभ्यता का कर्णवीर बताते हुए हम सब से तन, मन और धन से हिन्दी को स्वीकारने का आदेश देते हैं. पर दादा यदि आप  इन नेताओं से पूछ बेठिये की इनके बच्चे किन विद्द्यालयों में पढ रहे हैं तो ये आग बबूला हो जाते हैं. यदि आप इनसे नौकरशाही के बारे में पूछे की वे किस भाषा में रिपोर्ट और फाइल की नोटिंग लिखते/पढते हैं, तो ये आपको आँखें दिखने लगते हैं.
अब प्रश्न यह हैं की दोहरे मापदंड क्यूँ. उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में जाए और हमारे बच्चे हिन्दी को बढावा देने के लिए हिन्दी भाषी स्कूल में. और ये तब जब सम्पूर्ण विश्व एक सूत्र में बंध रहा हैं. व्यवसाय की भाषा अंग्रेजी हैं और युवाओं के लिए ये भाषा जानना मज़बूरी हैं. कंप्यूटरकरण के युग में जब प्रोग्रामिंग अंग्रेजी में हो सकती हैं तो हिन्दी को कैसे प्रासंगिक बनाया जाए.
राजनीति दिखावा का खेल हैं और कौन आपको कितना भावनात्मक रूप से प्रभावित कर सकता हैं, इस पर इनकी सफलता निर्भर करती हैं. इसलिए हिन्दी भाषा से प्रेम को देश प्रेम से जोड़ दिया गया हैं और यदि आपको हिन्दी नहीं आती तो आप दुनिए के तुच्छ लोगों में से हैं और आपको आत्म ग्लानी का भरपूर बोध करवाया जाएगा. परन्तु ऐसा क्यूँ जब सम्विन्धान हमे किसी भी भाषा का प्रयोग करने की स्वाधीनता देता हैं.
अब हमारे नेताओं के पास दो विकल्प हैं, या तो वो अपने वचन और कर्म एक ही स्थान  पर रखे, मतलब जो बोल रहे हैं, वो करके भी दिखाया. दूसरा संविधान में बदलाव लाये और हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाये.
अंत में हमारे घुमकड़ प्रधान मंत्री जी से भी एक अनुरोध हैं की विश्व क जो थोड़े देश रह गए हैं उनके यात्रा सूचि से, वह वे कृपया अपने उद्बोधन हिन्दी में दे, और संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा समिति में सदयस्ता की गुहार के साथ साथ हिन्दी को भी व्यवसाय की भाषा घोषित करवाए.

http://www.readwhere.com/read/c/6696975

Tuesday, September 22, 2015

व्हट्स एप्प पर हिन्दी सम्मलेन




10 से 12 सितम्बर 2015 तक भोपाल एक दुल्हन की तरह सजी रही और जगह जगह पर अंतरराष्ट्रिय हिन्दी सम्मलेन के बड़े बड़े पोस्टर लगे हुए थे. मुख्य मंत्री जी भी घूम घूम कर लोगों को, खासकर व्यापारी बंधुओं को अपने साईन बोर्ड हिन्दी में लगाने के लिए प्रोस्त्साहित कर रहे थे. यहाँ तक की पानी की टंकियां भी हिन्दी मई हो गयी हैं.
ऐसे में हम भी कहाँ पीछे रहने वाले. ठहरे हम भी पक्के भोपाली और भारतीय. हमने सोचा क्यूँ  न व्हाट्स एप्प नाम की एक नयी बीमारी पर हिन्दी सम्मलेन मनाया जाय. सो इसके एक समूह में हम सब ने तय किया की 3 दिन के लिए ही सही, समूह के नाम से लेकर सभी संवाद हिन्दी में किये जायेंगे. ड्रेस रिहर्सल 9 तारिख से ही प्रारंभ हो गया और हम 3 मित्र जो गाहे बगाहे थोड़ी अच्छी हिन्दी लिख बोल लेते हैं को अवसर मिल गया अपनी शुद्ध, क्लिष्ठ हिन्दी ज्ञान को बघारने का. मैं मृणाल पण्डे जी की लेखनी की बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ और उन्ही की तरह कोशिश की  कि एक भी शब्द आंग्ल भाषा का बीच में न आ जाये. समूह में इस दौर में कामयानी का भी आदान प्रदान हुआ, मेरे सर्व प्रिय दुष्यंत कुमार जी को भी बहुत पड़ा गया, कुछ मैथलीशरण गुप्त आये तो कुछ महादेवी वर्मा भी.
हम 3 – 4 मित्र अपनी हिन्दी में इतने मुग्ध थे की पता ही नहीं चला की एक वरिष्ठ साथी, जो केरला से हैं और अब ऑस्ट्रेलिया में बस गयी हैं ने समूह छोड़ दिया. मुझे जैसी ही ज्ञात हुआ मैंने तपाक से उन्हें पुनः जोड़ लिया और उनसे कारण जानना चाहा तो उन्होंने बताया की उन्हें हिन्दी वर्णमाला को पड़ने में कष्ट होता हैं. दो तीन पंक्ति के चुटकुलों तक तो वे अपने आप को प्रेरित कर लेती हैं परन्तु 25 – 50 पंक्तियाँ पड़ना और क्लिष्ठ हिन्दी को समझ पाना उनके लिए असंभव हैं. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया की यहाँ कोई गर्व का विषय नहीं हैं परन्तु हिन्दी कभी भी उनकी पहली भाषा नहीं रही. नतीजा यह हुआ की 11 की शाम तक हमारे इस समूह ने अपनी संवाद की भाषा को पुनः अंग्रेजी एवं हिंगलिश कर ली.
पर हम भी कहाँ मानने वाले थे साहब, हम पर तो हिन्दी का बुखार चड़ा था और हमने अपना हिन्दी में संवाद को निरंतर रखा. इस बीच एक और वरिष्ठ साथी अपनी एक अन्य समस्या पर चर्चा कर रहे थे. उन्हें संबोधित करना था, तो हमने अपने मित्रों से आंग्ल भाषा के सर का हिन्दी शब्द पूछ लिया तो जवाब मिला खोपड़ी और स्त्रीलिंग पुछा तो उत्तर आया खोपडिया. साड़ी हिन्दी की खुमारी उतर गयी. खूब हँसी ठिठोली हुई इस प्रसंग पर और एक बात और समझ आई. भाषा संवाद का माध्यम हैं और एक बहते पानी के स्त्रोत की तरह वह प्रत्येक स्थान से कुछ नया लेता हैं जो उसका अभिन्न अंग बन जाता हैं. क्या शुद्ध हैं और क्या विशुद्ध हैं पर चर्चा हो सकती हैं परन्तु भाषा को बनाये रखने के लिए यह ज़रूरी हैं की इसके बदलते स्वरुप को अपनाया जाए. यह भी सच हैं की बोल चाल की भाषा अलग होती हैं, लिखने की अलग एवं साहित्य की अलग. अब इसमें एक और श्रेणी आ गे हैं सॉफ्टवेर की या हमारे समूह के अनुसार कोमल पात्र की हिन्दी जिसे इस बार के अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मलेन में बहुत देखा गया. इन सभी श्रेणीओं में से किसे बढावा देना हैं और कैसे हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा बने ये चिंतन का विषय हैं.
नोट: अभी इस आलेख में दो भाग और हैं. आगे आप मित्रों से इस पर संवाद करुँगी 

http://www.readwhere.com/read/c/6615824 (ये ब्लॉग सुबह सवेरे समाचार पत्र में प्रकशित हुई हैं)


Sunday, September 6, 2015

उत्तर भारत के कृष्ण बनाम दक्षिण भारतीय कृष्ण

आज सुबह किसी के घर से निकलते वक़्त कुछ महिलाये बीते कल के जन्माष्टमी आयोजनों की चर्चा कर रही थी. स्वाभाव वश कदम थोड़े धीरे हो गए और जो सुना उसने सोचने को मजबूर कर दिया. कृष्ण मंदिरों की बात हो रही थी तो एक ने कहाँ की यहाँ आस पास कोई कृष्ण मंदिर नहीं हैं, दुसरे ने जवाब दिया की हैं, तो पट पहली ने कहाँ, अरे वो तो मद्रासियों का हैं. अपने गाडी में जाते जाते सोचा की अभी तक तो भगवानो को दिनों के हिसाब से बाटा था, अब क्षेत्र के आधार पर भी बाट दिया. उत्तर भारतीय कृष्ण और दक्षिण भारतीय कृष्ण कब से हो गए?
फिर सोचा की शायद समाज में ध्रुवीकरण या अलगावाद बहुत बड गया हैं- जाती, धर्म, वर्ग, लिंग, क्षेत्र, खान पान, उप जाती, आदि आदि कितने ही नामो पर विभाजन का एक सुनियोजित कार्यक्रम चल रहा हैं. आज से कुछ दो दशक पहले तक मुझे अपने गोत्र, या वर्ण के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी. मुझे घर पर केवल ये बताया गया था की मैं हिन्दू हूँ और जब कभी माँ कोई पूजा करवाती तो गोत्र पड़ा जाता था. कॉलेज में आई तो जाती अधिक समझ में आने लगी क्योंकि जिन छात्रों को जाती के नाम से वजीफ़ा मिलता था उनको नीची नज़रों से देखा जाता था और कुछ साथ वाले (खासकर वे जो इंजिनीरिंग या मेडिकल में फेल हो गए थे) बड़ी बुलंद आवाज़ में इसकी खिलाफत करते थे.
नौकरी में आई तो वर्ण व्यवस्था बहुत अच्छे से समझ आई क्योंकि रैगिंग के पहले दिन वर्ण और गोत्र पूछे गए तो मैंने गोत्र तो बता दिया पर वर्ण को लेकर थोडा कमजोर जवाब था. उस दिन घर जाकर बाबा से दोने समझे और ये भी पुछा की घर पर ये हमे क्यूँ नहीं सिखाया. उनसे उनके सभी मित्र जो घर आते थे उनके वर्ण के बारे में पुछा. उन्होंने अपने दो टूक अंदाज़ में कह दिया की आदमी का करैक्टर माइने रखता हैं, बाकी सारी चीज़े बकवास हैं.
आज वे 80 वर्ष के हैं और मैंने भी इन दो दशकों में बहुत से अनुभव लिए हैं और आसपास जो देखती हूँ, वो मन को परेशान कर देते हैं. आज मेरे घर के बच्चों को अपना गोत्र भी पता हैं और वर्ण भी, और लगातार वो दुसरे के वर्ण और धर्म के बारे में उत्सुक रहते हैं. शायद इसलिए की वे आज के बच्चे हैं- जो खाप के बारे में पड़ते हैं, जिन्होंने जीन्स को बैन होते सुना हैं, जो हिन्दू आतंकवाद और इस्लामिक आतंकवाद के बड़े में पड़ते हैं, जो ये देखते हैं की सरकार इस पर ज्यादा जोर दे रही हैं की मध्यन भोजन में अंडा दे सकते हैं की नहीं.
शायद वे ही उत्तर दे पाए की उत्तर भारत का कृष्ण कौन और दक्षिण भारत का कृष्ण कौन?

Wednesday, July 15, 2015

मध्य प्रदेश के शासन का सच

15 जुलाई २०१५ को प्रधान मंत्री जी ने बड़े धूम धाम से कौशल विकास का कार्येक्रम प्रारंभ किया. अपने उद्बोधन में उन्होंने युवाओं के भविष्य की चिंता की और वो सब कहाँ जो सुनने में बहुत अच्छा लगा. इसी तारिक को निति आयोग की भी बैठक बुलाई गयी जिसमे विभिन्न प्रदेशों के मुख्यमंत्री पधारे थे. मुद्दा था राज्यों का विकास. मुझे नहीं मालूम की हमारे मुख्य मंत्री जी ने विकास के लिए क्या दर्शन रखा और वो राज्य का भविष्य कैसा देखना चाहते हैं. परन्तु कुछ तथ्य जो जनता के सामने हैं, वे कुछ और ही हाले बयां कर रहे हैं.
मध्य प्रदेश में ४० प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं, जिसका अर्थ ये हैं की उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से विक्सित होने के लिए पर्याप्त पोषण नहीं मिल रहा हैं. ये सर्व विदित हैं की यदि शारीर नहीं बढेगा तो बुद्धि भी नहीं बढेगी, और यदि ये दोनों ही नहीं हैं तो कोई भी कौशल विकास कार्येक्रम, इन बच्चो को सकुशल नहीं कर पायेगा. कुछ दिन पूर्व मध्य रदेश की एक मंत्री जी ने सार्वजनिक रूप से कहाँ की मध्यान भोजन में बच्चों को अंडा देना चाहिए परन्तु मुख्य मंत्री जी अड़े रहे की केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाएगा.
आदिवासी लोग शहरी जीवन से दूर होते हैं और उन्हें शहरो में जीवन यापन करने के गुण नहीं आते. उन्हें रोज़गार युक्त बनाने के लिए सरकार उन्हें वजीफे देती हैं. परन्तु इसमें भी १२०० करोड़ का घोटाला हुआ हैं.ऐसी ही कुछ बात पिछड़ा वर्ग में भी देखने को मिला. इन बच्चो के शिक्षा का भविष्य इन छात्रवृत्ति पर ही निर्भर करती हैं. जिनके पास आधारभूत शिक्षा ही नहीं होगी, उन्हें सकुशल कैसे बनाएगी ये सरकार?
सरकारी इच्छा शक्ति की कमी का एक और उद्धरण हैं, भोपाल गैस त्रासिदी के लोगों के कौशल विकास के लिए 30 करोड़ रुपये खर्च किया गए पर जो व्यक्ति आज ३१ वर्ष का हो गया हैं, उसमे मात्र ४ माह में ऐसा क्या परिवर्तन प्रसिक्षण द्वारा लाया जा सकता हैं? जो एन जी ओ इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, उन्हें सरकार १४००० रुपये देती हैं प्रत्येक हितग्राही के लिए. साथ में यह शर्त भी हैं की ९० प्रतिशत हितग्राहियों का कौशल विकास हो और वे रोज़गार प्राप्त कर सकेगा. परन्तु यथा स्थिति कुछ और ही हैं. और इन सब के बीच व्यापम घोटाला जहाँ लोगों की भारती के लिए केवल पैसा ही कौशल हैं.
इन सभी बातों से ये बड़ा मुश्किल हैं प्रदेश को राष्ट्र की तुलना में आर्थिक रूप से खड़ा करना. प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय ५४००० हैं और राष्ट्र की ८५०००. हम सभी चाहते हैं की हमारा युवा आगे रोज़गार पाए और प्रदेश के आर्थिक  विकास में भागीदार बने. प्रदेश बड़े तो हम सब भी आगे बढेंगे. ये केवल भ्रष्टाचार का विषय नहीं हैं अपितु प्रशासन का प्रश्न हैं. सरकार की इच्छा शक्ति प्रबल होनी चाहिए. केवल कार्येक्रम चलाने से या फोटो खिचवाने से कुछ नहीं होगा.

Wednesday, July 8, 2015

व्यापम का खूनी खेल

अभी तक पूरे विश्व को "व्यापम" नाम के धोकेधड़ी की जानकारी मिल गयी हैं. वाशिंगटन पोस्ट और बीबीसी ने भी इस खबर को एहमियत दी हैं. पहली बार भारतीय मीडिया पर भी २४ घंटे व्यापम छाया हैं. विगत 3 वर्षो से मध्य प्रदेश में इस मुद्दे को लेकर राजनैतिक सरगर्मी बनी हुई हैं. यदि हम भ्रष्टाचार की बात करे तो शायद हमे इस घोटाले में अन्य घोटालो से बहुत अधिक अंतर नहीं दिखेगा, परन्तु यदि आप इसके पन्ने पलटेंगे तो पायेंगे की ये केवल लालच या राजनैतिक निम्नता की बात नहीं हैं.

भारत में इसके पूर्व भी बहुत से घोटाले हुए हैं और जिस प्रकार की हमारी प्रणाली हैं, आगे भी होते रहेंगे परन्तु किसी भी घोटाले में इतने लोगों की संदिग्ध हालातों में मौत नहीं हुई हैं. ये क्या केवल साक्ष्य छुपाने हेतु लोगों को हटाया जा राह हैं या इसके पीछे की कहानी कुछ और हैं. समय समय पर प्रदेश के मुख्य मंत्री एवं उनकी अर्धांगिनी का नाम भी आया हैं और राजनैतिक गलियारों में ये माना जाता हैं की षदियंत्र के सारे तार 1 श्यामला हिल से जुड़े हुए हैं. ७ जुलाई को मुख्य मंत्री जी ने आख़िरकार कहाँ की सिबिअई से इसकी जांच कराने पर उनको अथवा उनके दल को कोई आपत्ति नहीं हैं. 6 जुलाई तक वे तथा देश के गृह मंत्री सब कुछ माननीय उच्च न्यालय के हाथ में हैं कहकर अपना पल्ला झाड़ रहे थे. ऐसा क्या हुआ २४ घंटे में या यूँ कहें की ५ मिनट के फ़ोन कॉल में की मुख्य मंत्री जी जांच के लिए मान गए.

जैसे मैंने पहले भी लिखा की ये एकमात्र घोटाला हैं जिसमे करीब ५० लोगों की मौत हो गयी हैं जो इससे सम्बंधित थे या आरोपी थे. सबकी मृत्यु साधारण नहीं हैं. अधिकांश में ऐसा लग रहा हैं की उन्हें जेहर दिया गया हैं (समाचार पत्रों के आधार पर). क्या राज़ छिपा रहे थे ये सभी. जेल में भी जितने आरोपी अभी बंद हैं उनकी सुरक्षा पर भी सवाल या निशान खड़े हो गए हैं. जो एस आई टी इसकी जांच कर रही हैं उसपर भी भेद भाव करने के आरोप हैं. एक उच्च स्तरीय आई ए एस आधिकारी पर जांच एजेंसी बहुत मेहरबान रही हैं और व्यापन के निर्देशक रहे त्रिवेदी जी ने कहाँ हैं की उन्होंने ४२ लाख रूपए दिए थे. ऐसे कई और उद्धरण हैं पक्षपात के.

एक महतवपूर्ण बात जिसपर अभी सामाजिक या राजनैतिक चर्चा जोर नहीं पकड़ रही हैं वह हैं की जिन लोगों को लाभ पहुचने की कोशिश की गयी हैं वे सब कही न कही आर एस एस अथवा बीजेपी से जुड़े हैं. यदि आप इतिहास उठाकर देखेंगे की जितने भी फासिस्वादी नेता अथवा संगठन रहे हैं उन्होंने हमेशा पूरी प्रणाली को अपने रंग में रंग दिया हैं (हमारे यहाँ भागुअकरण हो रहा हैं). जो व्यक्ति २२-२३ वर्ष की आयु में सरकारी नौकरी में घुसा दिया जाएगा, वह जीवन भर उसी आदर्श को अपनाएगा जिसने उसे ये नौकरी दी हैं. हमारे प्रदेश में डॉक्टर, शिक्षक, पंचायत अधिकारी, पटवारी, लेकाधिकारी, आप नाम लीजिये और उस नौकरी में धन्द्लेबाज़ी  की गयी हैं क्यूंकि ये सभी परिक्षये व्यापम द्वारा करवाई गयी. ये किसी भी राष्ट्र और समाज के लिए घटक हैं. भारत की पहचान उसकी विविध्ता हैं, धर्मं, जाती, भाषा, खानपान, रंग, वर्ग, सभी में अंतर हैं परन्तु अनेकता में ही एकता हैं. यदि हम केवल एक ही धर्म या विचारधारा के लोग चाहते हैं, तो यह अब संभव नहीं हैं.

व्यापन घोटाले ने एक पूरी पीड़ी को बर्बाद कर दिया हैं. आज मध्य प्रदेश का कोई भी युवा डॉक्टर, शिक्षक, पटवारी काम पर निकलता हैं तो लोग उसे घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखता हैं. और वही दूसरी ओर जो मेधावी छात्र थे वे पुरे प्रणाली से आज उदसीन हैं. आज का युवा "जुगाड़" की भाषा सीख रहा हैं, न की मेहनत की.

समय आ गया हैं की हम समाज के रूप में जागृत हो और अपनी चेतनाओ का उपयोग करे. हो सकताहैं हम वर्तमान सत्ताशील दल के मतदाता हैं परन्तु आँख देखि मक्खी भी कैसे निगले.
जागृत हो! संवेदनशील हो!

Sunday, July 5, 2015

Juxtaposition of Facts and Fallacies

A leading Hindi newspaper carries a picture today of the Chief Minister of Madhya Pradesh clicking selfies with young girls and the caption below it reads that he was running form one place to another to get these selfies. Recently the Prime Minister of India urged the citizens of India to go for Selfies with Daughters and post it on the micro blogging site Twitter and on Facebook so as to promote girl child. After the Prime Minister went on air in his "Mann Ki Baat" with the idea of selfies, the government agencies took on the task that it becomes the number one trend on Twitter and claimed that world over this initiative has been appreciated. While this was going on, a young Bollywood actress and TV personality was hounded on the same SM platform for questioning the motive of the Prime Minister and she had to then write an open letter where she talked about issues beyond "selfies".
Another program launched with much fanfare has been the Digital India Program where the government wants people to be connected and avail the services of Internet so as to ease their lives. If one visits the website of this program, they will find that the main objective is to integrate various government departments and common man. Mr Prime Minister wants to harness the possibilities of digital technology for the well being of the nation and its citizens.
The reason that I talk about these two programs is because both are somewhere inter linked and somehow wants to give an impression to the common man that all is well. These initiatives sound positive, touch your emotional chords and you find 2 percent of the population jumping on to the various social media platforms and overwhelming us with their selfies and comments. If you belong to the other 5 percent which finds all this hogwash and want the government to really work on the ground and get its priorities right, then you are in for some good abusing and calling names (if you happen to be  a twitterati or a Facebookian).
I as a women and a tax paying citizen of the country has some serious reservations regarding the portrayal of these important issues. Selfie was something which started as a trend for the glamorous and the famous to share some candid moments with their fans & followers. Mr Prime Minister went a step ahead and shared some of his selfies with leaders all over the world. Our Chief Minister followed suit and now instead of putting his pictures with girl child on posters he clicks selfies with them. If the government thinks that by putting the hashtag of Selfies with Daughter they will be able to uplift the situation of girls in the country, they are living in a fools paradise. And if the Chief Minister of a state does so it seems as of there is an identity crisis which there should not be. A state which has the highest number of rapes and crimes recorded for the past so many years, a selfie seems more like a slap. Digital India is a good initiative though this very party criticized Mr Rajiv Gandhi and his team when they came up with the idea of computerizing all the departments. The question is how they go about Digitizing India and what is the time limit set. If our Chief Minister had rather given desktops to the girls and initiated a free website where they can access books in Hindi, the girls would be empowered.
We do not want the government to start changing the society and how it thinks especially for girls, because that is something which we ourselves have to do, but Yes we want the government to govern. It has to be strict with the perpetrators of hate and violence towards girls. It has to be equally stringent with its set of Ministers who come out with atrocious statements against women. It has to take electricity and roads to the people so that people can access computers and internet.
The basic is that the government has to get it's priorities right. If our Chief Minister is unaware of ground realities or what we the citizens want, I on behalf of my fellow citizens can give him some pointers.
1. Co-ordiantion between the various departments so that the same work is not handled by many.
2. Clean drinking water.
3. Uninterrupted power supply without voltage fluctuations.
4. Roads without pitfalls.
5. Promises that can be fulfilled in a given time frame.
And the list continues.
PS: If we can hear you Mr Chief Minister for once being honest about the VYAPAM Scam, it will be good for everybody's health.

Sunday, July 13, 2014

Indian Budget- More of a Tradition




The annual Indian budget is out and media discussions are rife about what the government did right and where it could have done better. Political parties are reacting on the predicted lines. I too have my reservations and analysis of this year’s budget. What does this budget mean for the aam aadmi? Do budgets really matter for the common man anymore or for that sake, does the industry take the budget as seriously as before?
            Post 1991, every passing year shows that the Annual Budget is more of a tradition now than a serious financial statement. With markets being deregulated price control is not a major issue and decisions regarding excise duty, import tariffs, subsidies are taken all the year round. Fiscal policy is a major part of the budget where this time the entire tax system has been handled in the old way though promises of gargantuan nature were made before polls and budget by the present BJP government. Though GST was anathema for BJP in the past, it has embraced it enthusiastically now which is “interesting”. How subsides and welfare program spending will be handled is a tricky question which has not been answered substantially by the Finance Minister.
            29 schemes have been allotted 100 crores each which does not make sense as the amount is too small for these projects and there is no roadmap regarding the source of revenue.
            However my biggest concern is the amount given for infrastructure. 27600 crores have been earmarked for various projects. Somewhere the land mafia influencing the budget seems high. Even during the UPA regime, money was misspent and projects took longer than required which escalated the costs. The priority for the government should be to see that implementation of these projects is on time and there are no sidekicks passed out.
            Another allocation which is beyond comprehension is the amount allocated for building the iron statue of Vallabhai Patel. 200 crores have been allocated for this. It was the pet project of the then Chief Minister of Gujarat, Mr Narendra Bhai Modi for which he also collected iron from all over the country. Now why does the government want to spend so much of the tax payer’s money on such a project and allocate just 100 crores for women safety is beyond logic.
            Similarly 100 crores have been allocated for a survey to be done on inter linking the rivers. We have had many committees and sub committees on this issue, therefore having another survey costing 100 crores is insane.
Making MNREGA more practical and financially viable is a good initiative of the government. Asset creation is a must for these welfare schemes because mere handouts will not lead to poverty alleviation.
If we talk about the state of Madhya Pradesh in this budget, then we find that much has not been given to our state. If just take the railways, we find that we have the lowest railway network of 16.67 km/ 1000 sq kms whereas the national average is 24 kms. We have been kept out of the Golden Quadrilateral which was a NDA program. Similarly our road network is also very poor at 110,000 kms where our neigbouring state Maharashtra which is smaller in size has 250,000 kms of roads. Though we have BJP both at centre and in our state, we have not been given the status of privileged state. We have 21 percent tribal population which is the highest in the country, highest IMR and MMR rate (poor roads is one of the cause for these rates to be high) among other poor indicators.
Budgets have become more of a tradition and less of an important financial statement because it lacks government vision. Policies of the government are not clearly spelt out. Political will is the most important thing for this country which is somehow lacking.